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mahabharat 9.38.33-34: भरतनंदन! महाराज! एक समय की बात है, सुन्दर नेत्रों वाली एक सुन्दरी सरस्वती नदी के जल में स्नान कर रही थी। संयोगवश मंकणक ऋषि की दृष्टि उस पर पड़ गई और उनका वीर्य स्खलित होकर जल में गिर गया। 33-34।   |   mahabharat अध्याय 9.38: सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति, महिमा और मंकणक मुनिका चरित्र   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 38: सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति, महिमा और मंकणक मुनिका चरित्र  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  9.38.33-34 
दृष्ट्वा यदृच्छया तत्र स्त्रियमंभसि भारत॥ ३३॥
जायन्तीं रुचिरापाङ्गीं दिग्वाससमनिन्दिताम्।
सरस्वत्यां महाराज चस्कन्दे वीर्यमम्भसि॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
भरतनंदन! महाराज! एक समय की बात है, सुन्दर नेत्रों वाली एक सुन्दरी सरस्वती नदी के जल में स्नान कर रही थी। संयोगवश मंकणक ऋषि की दृष्टि उस पर पड़ गई और उनका वीर्य स्खलित होकर जल में गिर गया। 33-34।
 
Bharatanandan! Maharaj! Once upon a time, a beautiful lady with beautiful eyes was bathing in the waters of Saraswati. By chance, the sage Mankanak's eyes fell on her and his semen ejaculated and fell into the water. 33-34.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)