Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 9.37.54: हे जनमेजय! तत्पश्चात् सरस्वती जी बहुत से कुंज बनाती हुई लौट गईं, क्योंकि उनका हृदय उन धर्मपरायण एवं तपस्वी मुनियों के प्रति दया से भर गया था।   |   mahabharat अध्याय 9.37: विनशन, सुभूमिक, गन्धर्व, गर्गस्रोत, शंख, द्वैतवन तथा नैमिषेय आदि तीर्थोंमें होते हुए बलभद्रजीका सप्त सारस्वततीर्थमें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 37: विनशन, सुभूमिक, गन्धर्व, गर्गस्रोत, शंख, द्वैतवन तथा नैमिषेय आदि तीर्थोंमें होते हुए बलभद्रजीका सप्त सारस्वततीर्थमें प्रवेश  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  9.37.54 
तत: कुञ्जान् बहून् कृत्वा संनिवृत्ता सरस्वती।
ऋषीणां पुण्यतपसां कारुण्याज्जनमेजय॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
हे जनमेजय! तत्पश्चात् सरस्वती जी बहुत से कुंज बनाती हुई लौट गईं, क्योंकि उनका हृदय उन धर्मपरायण एवं तपस्वी मुनियों के प्रति दया से भर गया था।
 
O Janamejaya! Thereafter Saraswati turned back creating many bowers, because her heart was filled with compassion for those pious and ascetic sages.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)