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mahabharat 9.37.45: पुरुषसिंह! तीर्थयात्रा के लोभ से वे ब्रह्मऋषि समन्तपंचक तीर्थ पर्यन्त सरस्वती नदी के तट पर ही रहे।   |   mahabharat अध्याय 9.37: विनशन, सुभूमिक, गन्धर्व, गर्गस्रोत, शंख, द्वैतवन तथा नैमिषेय आदि तीर्थोंमें होते हुए बलभद्रजीका सप्त सारस्वततीर्थमें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 37: विनशन, सुभूमिक, गन्धर्व, गर्गस्रोत, शंख, द्वैतवन तथा नैमिषेय आदि तीर्थोंमें होते हुए बलभद्रजीका सप्त सारस्वततीर्थमें प्रवेश  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  9.37.45 
समन्तपञ्चकं यावत्तावत्ते द्विजसत्तमा:।
तीर्थलोभान्नरव्याघ्र नद्यास्तीरं समाश्रिता:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
पुरुषसिंह! तीर्थयात्रा के लोभ से वे ब्रह्मऋषि समन्तपंचक तीर्थ पर्यन्त सरस्वती नदी के तट पर ही रहे।
 
Purusha Singh! Due to greed for pilgrimage, those Brahmarishis stayed on the banks of river Saraswati till Samantapanchak Tirtha.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)