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श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 37: विनशन, सुभूमिक, गन्धर्व, गर्गस्रोत, शंख, द्वैतवन तथा नैमिषेय आदि तीर्थोंमें होते हुए बलभद्रजीका सप्त सारस्वततीर्थमें प्रवेश  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  9.37.44 
ऋषीणां बहुलत्वात्तु सरस्वत्या विशाम्पते।
तीर्थानि नगरायन्ते कूले वै दक्षिणे तदा॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
हे प्रजानाथ! ऋषियों की अधिक संख्या के कारण सरस्वती के दक्षिणी तट पर स्थित सभी तीर्थ नगरों के समान प्रतीत होने लगे।
 
O Prajanath! Due to the large number of sages, all the places of pilgrimage on the southern bank of Saraswati began to look like cities. 44.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)