श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 37: विनशन, सुभूमिक, गन्धर्व, गर्गस्रोत, शंख, द्वैतवन तथा नैमिषेय आदि तीर्थोंमें होते हुए बलभद्रजीका सप्त सारस्वततीर्थमें प्रवेश  »  श्लोक 27-28h
 
 
श्लोक  9.37.27-28h 
पुण्यं द्वैतवनं राजन्नाजगाम हलायुध:।
तत्र गत्वा मुनीन् दृष्ट्वा नानावेषधरान् बल:॥ २७॥
आप्लुत्य सलिले चापि पूजयामास वै द्विजान्।
 
 
अनुवाद
राजा! वहाँ से हलधर बलभद्र पवित्र द्वैतवन में आये और वहाँ नाना प्रकार के वेश धारण किये हुए ऋषियों को देखकर उन्होंने जल में डुबकी लगाई और ब्राह्मणों का पूजन किया।
 
King! From there Haldhar Balbhadra came to the sacred Dwaitvan and after seeing the sages dressed in various attires there, he took a dip in the water and worshipped the Brahmins.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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