श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 37: विनशन, सुभूमिक, गन्धर्व, गर्गस्रोत, शंख, द्वैतवन तथा नैमिषेय आदि तीर्थोंमें होते हुए बलभद्रजीका सप्त सारस्वततीर्थमें प्रवेश  »  श्लोक 14-16
 
 
श्लोक  9.37.14-16 
तत्र गर्गेण वृद्धेन तपसा भावितात्मना॥ १४॥
कालज्ञानगतिश्चैव ज्योतिषां च व्यतिक्रम:।
उत्पाता दारुणाश्चैव शुभाश्च जनमेजय॥ १५॥
सरस्वत्या: शुभे तीर्थे विदिता वै महात्मना।
तस्य नाम्ना च तत् तीर्थं गर्गस्रोत इति स्मृतम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय! वहाँ तप से शुद्ध हृदय वाले महाबली गर्ग ने सरस्वती के उस पावन तीर्थ पर काल, उसकी गति, ग्रह-नक्षत्रों के परिवर्तन, भयंकर विपत्तियों और शुभ लक्षणों का ज्ञान प्राप्त किया था। उन्हीं के नाम पर उस तीर्थ का नाम गर्गस्रोत है॥14-16॥
 
Janamejaya! There, the great old Garga, who had a pure heart by his penance, had acquired the knowledge of time, its speed, the changes in the planets and stars, terrible calamities and auspicious signs - all these things at that auspicious place of Saraswati. That place of pilgrimage is called Gargasrot after his name.॥ 14-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)