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mahabharat 9.36.9-10h: उनके धर्मात्मा पिता गौतम उनकी तपस्या, नियम और इन्द्रिय-संयम से सदैव प्रसन्न रहते थे ॥9 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 9.36: उदपानतीर्थकी उत्पत्तिकी तथा त्रित मुनिके कूपमें गिरने, वहाँ यज्ञ करने और अपने भाइयोंको शाप देनेकी कथा   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 36: उदपानतीर्थकी उत्पत्तिकी तथा त्रित मुनिके कूपमें गिरने, वहाँ यज्ञ करने और अपने भाइयोंको शाप देनेकी कथा  »  श्लोक 9-10h
 
 
श्लोक  9.36.9-10h 
तेषां तु तपसा प्रीतो नियमेन दमेन च॥ ९॥
अभवद् गौतमो नित्यं पिता धर्मरत: सदा।
 
 
अनुवाद
उनके धर्मात्मा पिता गौतम उनकी तपस्या, नियम और इन्द्रिय-संयम से सदैव प्रसन्न रहते थे ॥9 1/2॥
 
His pious father Gautam was always pleased with his penance, rules and control over the senses. 9 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)