श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 36: उदपानतीर्थकी उत्पत्तिकी तथा त्रित मुनिके कूपमें गिरने, वहाँ यज्ञ करने और अपने भाइयोंको शाप देनेकी कथा  »  श्लोक 38-39
 
 
श्लोक  9.36.38-39 
तत: सुतुमुलं शब्दं शुश्रावाथ बृहस्पति:॥ ३८॥
श्रुत्वा चैवाब्रवीत् सर्वान् देवान् देवपुरोहित:।
त्रितस्य वर्तते यज्ञस्तत्र गच्छामहे सुरा:॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
तब देव पुरोहित बृहस्पति जी ने वेद मन्त्रों की उस गर्जनापूर्ण ध्वनि को सुनकर देवताओं से कहा- 'देवगण! त्रित मुनिका यज्ञ हो रहा है, हमें वहाँ चलना चाहिए।
 
Then the god priest Brihaspati ji, hearing that thunderous sound of Veda mantras, said to the gods – 'Devgan! Trit Munika Yagya is taking place, we should go there.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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