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श्लोक 9.36.33  |
पांसुग्रस्ते तत: कूपे विचिन्त्य सलिलं मुनि:।
अग्नीन् संकल्पयामास होतॄनात्मानमेव च॥ ३३॥ |
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| अनुवाद |
| ऋषि ने बालू से भरे हुए कुएँ में जल की कल्पना की और अपने संकल्प से उसमें अग्नि की स्थापना की तथा होता आदि के स्थान पर स्वयं को स्थापित किया ॥33॥ |
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| The sage imagined water in the sand-filled well and by his resolve established fire in it and in place of Hota etc. he established himself. ॥ 33॥ |
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