श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 36: उदपानतीर्थकी उत्पत्तिकी तथा त्रित मुनिके कूपमें गिरने, वहाँ यज्ञ करने और अपने भाइयोंको शाप देनेकी कथा  »  श्लोक 14-16
 
 
श्लोक  9.36.14-16 
कदाचिद्धि ततो राजन् भ्रातरावेकतद्वितौ॥ १४॥
यज्ञार्थं चक्रतुश्चिन्तां तथा वित्तार्थमेव च।
तयोर्बुद्धि: समभवत् त्रितं गृह्य परंतप॥ १५॥
याज्यान् सर्वानुपादाय प्रतिगृह्य पशूंस्तत:।
सोमं पास्यामहे हृष्टा: प्राप्य यज्ञं महाफलम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! एक समय उनके दोनों भाई एकत और द्वीत यज्ञ और धन के विषय में सोचने लगे। हे शत्रुओं को कष्ट देने वाले राजन! उनके मन में विचार आया कि हमें त्रित को साथ लेकर यजमानों का यज्ञ करना चाहिए और बहुत से पशु दक्षिणा में लेकर परम फलदायी यज्ञ करना चाहिए तथा उसमें सुखपूर्वक सोम रस का पान करना चाहिए।
 
O King! Once, his two brothers Ekata and Dvit started thinking about the sacrifice and wealth. O King who causes trouble to his enemies! The thought came to his mind that we should take Trit along with us and perform the sacrifice of the Yajmans and get many animals as Dakshina and perform the highly fruitful sacrifice and happily drink the Som Rasa in it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)