Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 9.35.88-90: भगवान कृष्ण के बड़े भाई, हलवाहा बलराम ने वहाँ विधिपूर्वक स्नान किया, उत्तम दान दिया, रात्रि विश्राम किया और फिर शीघ्रता से उदापान तीर्थ की ओर चल पड़े, जो एक पुण्य तीर्थ है। हे राजा जनमेजय! उदापान वह तीर्थ है जहाँ उपस्थित होने मात्र से महान फल प्राप्त होते हैं। वहाँ के सिद्ध पुरुष औषधियों (वृक्षों और लताओं) की कोमलता और भूमि की आर्द्रता देखकर अदृश्य सरस्वती को भी पहचान लेते हैं। 88-90 | mahabharat अध्याय 9.35: बलदेवजीकी तीर्थयात्रा तथा प्रभास-क्षेत्रके प्रभावका वर्णनके प्रसंगमें चन्द्रमाके शापमोचनकी कथा । mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
भगवान कृष्ण के बड़े भाई, हलवाहा बलराम ने वहाँ विधिपूर्वक स्नान किया, उत्तम दान दिया, रात्रि विश्राम किया और फिर शीघ्रता से उदापान तीर्थ की ओर चल पड़े, जो एक पुण्य तीर्थ है। हे राजा जनमेजय! उदापान वह तीर्थ है जहाँ उपस्थित होने मात्र से महान फल प्राप्त होते हैं। वहाँ के सिद्ध पुरुष औषधियों (वृक्षों और लताओं) की कोमलता और भूमि की आर्द्रता देखकर अदृश्य सरस्वती को भी पहचान लेते हैं। 88-90
Lord Krishna's elder brother, Balarama, the ploughman, bathed there according to the rituals, gave a good donation and stayed there for a night, and then in great haste proceeded to Udapana Tirtha, which is an auspicious pilgrimage. O King Janmejaya! Udapana is that pilgrimage where one gets great benefits merely by being present there. Siddha Purushas there, by seeing the softness of the medicinal herbs (trees and creepers) and the moisture of the ground, can even recognize the invisible Saraswati. 88-90.
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां प्रभासोत्पत्तिकथने पञ्चत्रिंशोऽध्याय:॥ ३५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें प्रभासतीर्थका वर्णनविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३५॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥