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mahabharat 9.33.55: कुन्तीपुत्र! शरद ऋतु के निर्जल मेघों के समान व्यर्थ गर्जना मत करो। आज तुम्हारे पास जो भी बल है, उसे युद्ध में प्रकट करो। 55॥   |   mahabharat अध्याय 9.33: श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको फटकारना, भीमसेनकी प्रशंसा तथा भीम और दुर्योधनमें वाग्युद्ध   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  9.33.55 
मा वृथा गर्ज कौन्तेय शारदाभ्रमिवाजलम्।
दर्शयस्व बलं युद्धे यावत् तत् तेऽद्य विद्यते॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
कुन्तीपुत्र! शरद ऋतु के निर्जल मेघों के समान व्यर्थ गर्जना मत करो। आज तुम्हारे पास जो भी बल है, उसे युद्ध में प्रकट करो। 55॥
 
Kuntiputra! Do not roar in vain like the waterless clouds of autumn. Whatever strength you have today, show it in the war. 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)