श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 32: युधिष्ठिरके कहनेसे दुर्योधनका तालाबसे बाहर होकर किसी एक पाण्डवके साथ गदायुद्धके लिये तैयार होना  »  श्लोक 67-68
 
 
श्लोक  9.32.67-68 
योत्स्येऽहं संगरं प्राप्य विजेष्ये च रणाजिरे॥ ६७॥
अहमद्य गमिष्यामि वैरस्यान्तं सुदुर्गमम्।
गदया पुरुषव्याघ्र हेमपट्टनिबद्धया॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
रणभूमि में पहुँचकर मैं तुममें से किसी एक के साथ युद्ध करूँगा और मुझे विश्वास है कि युद्धभूमि में मेरी विजय होगी। हे नरसिंह! आज मैं स्वर्णपत्रों वाली गदा की सहायता से वैरा के उस पार पहुँचूँगा, जहाँ किसी का भी जाना अत्यन्त कठिन है। 67-68।
 
‘On reaching the battlefield, I will fight with any one of you and I am sure that I will be victorious in the battle-field. O lion of men! Today, with the help of the golden-leafed mace, I will reach the other side of Vaira, where it is extremely difficult for anyone to go. 67-68.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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