श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 32: युधिष्ठिरके कहनेसे दुर्योधनका तालाबसे बाहर होकर किसी एक पाण्डवके साथ गदायुद्धके लिये तैयार होना  »  श्लोक 57-58
 
 
श्लोक  9.32.57-58 
न्यायेन युध्यतां प्रोक्ता शक्रलोकगति: परा॥ ५७॥
यद्येकस्तु न हन्तव्यो बहुभिर्धर्म एव तु।
तदाभिमन्युं बहवो निजघ्नुस्त्वन्मते कथम्॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
कहा गया है कि न्यायपूर्वक युद्ध करने वाले शूरवीरों को उत्तम इन्द्रलोक की प्राप्ति संभव है। यदि 'बहुत से योद्धा मिलकर एक ही वीर को न मारें' यह धर्म है, तो फिर आपके उपदेश से अनेक महारथियों ने अभिमन्यु को कैसे मार डाला?॥ 58॥
 
It has been said that the attainment of the most excellent Indraloka is possible for the braves who fight justly. If 'many warriors should not kill a single brave man together' is the Dharma, then how did many great warriors kill Abhimanyu with your advice?॥ 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)