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mahabharat 9.32.56-57h: वास्तव में क्षत्रिय धर्म बड़ा क्रूर है, किसी से कुछ अपेक्षा नहीं रखता और अत्यन्त क्रूर है; अन्यथा तुम सब लोग धर्मात्मा, वीर और युद्ध में शरीर त्यागने को तत्पर होने पर भी उस असहाय अवस्था में अभिमन्यु को कैसे मार सकते थे॥56 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 9.32: युधिष्ठिरके कहनेसे दुर्योधनका तालाबसे बाहर होकर किसी एक पाण्डवके साथ गदायुद्धके लिये तैयार होना   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 32: युधिष्ठिरके कहनेसे दुर्योधनका तालाबसे बाहर होकर किसी एक पाण्डवके साथ गदायुद्धके लिये तैयार होना  »  श्लोक 56-57h
 
 
श्लोक  9.32.56-57h 
क्षत्रधर्मं भृशं क्रूरं निरपेक्षं सुनिर्घृणम्।
अन्यथा तु कथं हन्युरभिमन्युं तथा गतम्॥ ५६॥
सर्वे भवन्तो धर्मज्ञा: सर्वे शूरास्तनुत्यज:।
 
 
अनुवाद
वास्तव में क्षत्रिय धर्म बड़ा क्रूर है, किसी से कुछ अपेक्षा नहीं रखता और अत्यन्त क्रूर है; अन्यथा तुम सब लोग धर्मात्मा, वीर और युद्ध में शरीर त्यागने को तत्पर होने पर भी उस असहाय अवस्था में अभिमन्यु को कैसे मार सकते थे॥56 1/2॥
 
In reality, Kshatriya religion is very cruel, does not expect anything from anyone and is extremely cruel; Otherwise, how could you all kill Abhimanyu in that helpless state, despite being religious, brave and ready to sacrifice your body in battle. 56 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)