श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 32: युधिष्ठिरके कहनेसे दुर्योधनका तालाबसे बाहर होकर किसी एक पाण्डवके साथ गदायुद्धके लिये तैयार होना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  9.32.3 
यस्यातपत्रच्छायापि स्वका भानोस्तथा प्रभा।
खेदायैवाभिमानित्वात् सहेत् सैवं कथं गिर:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
अपने अहंकार के कारण छत्र की छाया और सूर्य की किरणें भी उसके हृदय में दुःख उत्पन्न करती थीं। वह ऐसे कठोर वचन कैसे सहन कर सकता था?
 
Because of his pride, even the shade of his umbrella and the rays of the sun caused sorrow in his heart. How could he tolerate such harsh words?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)