श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 32: युधिष्ठिरके कहनेसे दुर्योधनका तालाबसे बाहर होकर किसी एक पाण्डवके साथ गदायुद्धके लिये तैयार होना  »  श्लोक 19-23h
 
 
श्लोक  9.32.19-23h 
अद्यानृण्यं गमिष्यामि क्षत्रियाणां यशस्विनाम्॥ १९॥
बाह्लीकद्रोणभीष्माणां कर्णस्य च महात्मन:।
जयद्रथस्य शूरस्य भगदत्तस्य चोभयो:॥ २०॥
मद्रराजस्य शल्यस्य भूरिश्रवस एव च।
पुत्राणां भरतश्रेष्ठ शकुने: सौबलस्य च॥ २१॥
मित्राणां सुहृदां चैव बान्धवानां तथैव च।
आनृण्यमद्य गच्छामि हत्वा त्वां भ्रातृभि: सह॥ २२॥
एतावदुक्त्वा वचनं विरराम जनाधिप:।
 
 
अनुवाद
‘भरतश्रेष्ठ! आज मैं अपने भाइयों सहित आपको मारकर उन यशस्वी क्षत्रियों का ऋण चुकाऊँगा। मैं बाह्लीक, द्रोण, भीष्म, महामना कर्ण, वीर जयद्रथ, भगदत्त, मद्रराजसल्य, भूरिश्रवा, सुबलकुमार शकुनि तथा अपने पुत्रों, मित्रों, बन्धुओं और सम्बन्धियों के ऋण से भी उऋण हो जाऊँगा।’ इतना कहकर राजा दुर्योधन चुप हो गया। 19—22 1/2॥
 
‘Bharatshrestha! Today, by killing you along with my brothers, I will become indebted to those famous Kshatriyas. I will also become indebted to the debt of Bahlika, Drona, Bhishma, Mahamana Karna, brave Jayadratha, Bhagadatta, Madrarajasalya, Bhurishrava, Subalkumar Shakuni and my sons, friends, relatives and relatives.' King Duryodhana became silent after saying this. 19—22 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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