श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 32: युधिष्ठिरके कहनेसे दुर्योधनका तालाबसे बाहर होकर किसी एक पाण्डवके साथ गदायुद्धके लिये तैयार होना  »  श्लोक 18-19h
 
 
श्लोक  9.32.18-19h 
अद्य व: सरथान् साश्वानशस्त्रो विरथोऽपि सन्।
नक्षत्राणीव सर्वाणि सविता रात्रिसंक्षये॥ १८॥
तेजसा नाशयिष्यामि स्थिरीभवत पाण्डवा:।
 
 
अनुवाद
पाण्डवों! तुम डटे रहो। आज मैं अस्त्र-शस्त्र और रथ से रहित होते हुए भी, घोड़ों और रथों पर सवार होकर आए हुए तुम सब लोगों को अपने तेज से नष्ट कर दूँगा, जैसे रात्रि के अंत में सूर्यदेव अपने तेज से समस्त तारों को अदृश्य कर देते हैं॥18 1/2॥
 
Pandvas! Stand firm. Today, even though I am devoid of arms and chariots, I will destroy all of you who have come on horses and chariots with my brilliance, just as the Sun God makes all the stars invisible with his brilliance at the end of the night.॥ 18 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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