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mahabharat 9.31.27: तू अपने को वीर समझता है, परन्तु तू वीर नहीं है। हे भरतवंशी मूर्ख राजा! तू सबके सुनते हुए व्यर्थ ही कहता रहता है कि मैं वीर हूँ॥ 27॥   |   mahabharat अध्याय 9.31: पाण्डवोंका द्वैपायनसरोवरपर जाना, वहाँ युधिष्ठिर और श्रीकृष्णकी बातचीत तथा तालाबमें छिपे हुए दुर्योधनके साथ युधिष्ठिरका संवाद   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  9.31.27 
शूरमानी न शूरस्त्वं मृषा वदसि भारत।
शूरोऽहमिति दुर्बुद्धे सर्वलोकस्य शृण्वत:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
तू अपने को वीर समझता है, परन्तु तू वीर नहीं है। हे भरतवंशी मूर्ख राजा! तू सबके सुनते हुए व्यर्थ ही कहता रहता है कि मैं वीर हूँ॥ 27॥
 
‘You consider yourself a brave man, but you are not one. O foolish king of the Bharat dynasty! You keep saying in vain that ‘I am a brave man’ in the hearing of everyone.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)