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mahabharat 9.3.57-58h: कौरवों! युद्ध के मार्ग से बढ़कर स्वर्ग जाने का कोई उत्तम मार्ग नहीं है। दीर्घकाल तक पुण्य कर्म करने से जो पुण्य लोक प्राप्त होते हैं, वे वीर क्षत्रिय युद्ध के द्वारा तुरन्त प्राप्त कर लेते हैं।॥57 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 9.3: कर्णके मारे जानेपर पाण्डवोंके भयसे कौरव-सेनाका पलायन, सामना करनेवाले पचीस हजार पैदलोंका भीमसेनद्वारा वध तथा दुर्योधनका अपने सैनिकोंको समझा-बुझाकर पुन: पाण्डवोंके साथ युद्धमें लगाना   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 3: कर्णके मारे जानेपर पाण्डवोंके भयसे कौरव-सेनाका पलायन, सामना करनेवाले पचीस हजार पैदलोंका भीमसेनद्वारा वध तथा दुर्योधनका अपने सैनिकोंको समझा-बुझाकर पुन: पाण्डवोंके साथ युद्धमें लगाना  »  श्लोक 57-58h
 
 
श्लोक  9.3.57-58h 
न युद्धधर्माच्छ्रेयान् हि पन्था: स्वर्गस्य कौरवा:॥ ५७॥
सुचिरेणार्जिताँल्लोकान् सद्यो युद्धात् समश्नुते।
 
 
अनुवाद
कौरवों! युद्ध के मार्ग से बढ़कर स्वर्ग जाने का कोई उत्तम मार्ग नहीं है। दीर्घकाल तक पुण्य कर्म करने से जो पुण्य लोक प्राप्त होते हैं, वे वीर क्षत्रिय युद्ध के द्वारा तुरन्त प्राप्त कर लेते हैं।॥57 1/2॥
 
‘Kauravas! There is no better way to heaven than the path of war. The virtuous worlds that are attained by performing virtuous deeds for a long time are instantly attained by a brave Kshatriya through war.’॥ 57 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)