श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 29: बची हुई समस्त कौरव-सेनाका वध, संजयका कैदसे छूटना, दुर्योधनका सरोवरमें प्रवेश तथा युयुत्सुका राजमहिलाओंके साथ हस्तिनापुरमें जाना  »  श्लोक 103
 
 
श्लोक  9.29.103 
निरानन्दं गतश्रीकं हृताराममिवाशयम्।
शून्यरूपमपध्वस्तं दु:खाद् दु:खतरोऽभवत्॥ १०३॥
 
 
अनुवाद
वहाँ न तो कोई हर्ष था, न कोई वैभव। वह राजमहल उस तालाब के समान वीरान और उजड़ा हुआ प्रतीत हो रहा था, जिसके किनारे का बगीचा नष्ट हो गया हो। वहाँ पहुँचकर विदुरजी शोक से अत्यन्त दुःखी हो गए॥103॥
 
There was neither joy nor splendour there. That royal palace appeared deserted and ruined like a pond whose garden on the bank has been destroyed. On reaching there Vidurji became very sad with grief.॥ 103॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)