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श्लोक 9.25.53-54  |
तस्मिन् देशे व्यवस्थाय यत्र शारद्वत: स्थित:।
सम्प्रद्रुता वयं पञ्च किरीटिशरपीडिता:॥ ५३॥
धृष्टद्युम्नं महारौद्रं तत्र नोऽभूद् रणो महान्।
जितास्तेन वयं सर्वे व्यपयाम रणात् तत:॥ ५४॥ |
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| अनुवाद |
| मैं उसी स्थान से युद्ध कर रहा था जहाँ कृपाचार्य उपस्थित थे; किन्तु किरीटधारी अर्जुन के बाणों से पीड़ित होकर हम पाँचों वहाँ से भागकर अत्यन्त भयंकर धृष्टद्युम्न के पास पहुँचे। वहाँ हमारा उसके साथ घोर युद्ध हुआ। उसने हम सबको परास्त कर दिया। फिर हम वहाँ से भी भाग गए॥ 53-54॥ |
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| I was fighting from the same place where Krupacharya was present; but being afflicted by the arrows of the crown-wearing Arjun, we five fled from there and reached the extremely fearsome Dhrishtadyumna. There we had a huge battle with him. He defeated us all. Then we fled from there as well.॥ 53-54॥ |
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