श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 24: श्रीकृष्णके सम्मुख अर्जुनद्वारा दुर्योधनके दुराग्रहकी निन्दा और रथियोंकी सेनाका संहार  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  9.24.48 
एवं पश्यामि वार्ष्णेय चिन्तयन् प्रज्ञया स्वया।
विदुरस्य च वाक्येन चेष्टया च दुरात्मन:॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
‘वृष्णिनन्दन! मैं अपनी बुद्धि से विचार करके, विदुरजी के वचनों से तथा दुष्टात्मा दुर्योधन के प्रयत्नों से भी ऐसा ही घटित होता हुआ देखता हूँ ॥48॥
 
‘Vrishninandan! I see the same thing happening after thinking through my intelligence, Vidurji's words and the efforts of the evil soul Duryodhana. 48॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd