श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 24: श्रीकृष्णके सम्मुख अर्जुनद्वारा दुर्योधनके दुराग्रहकी निन्दा और रथियोंकी सेनाका संहार  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  9.24.43 
यो हि श्रुत्वा वच: पथ्यं जामदग्न्याद् यथातथम्।
अवामन्यत दुर्बुद्धिर्ध्रुवं नाशमुखे स्थित:॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
जो मूर्ख मनुष्य यमदग्निनन्दन परशुरामजी के सत्य एवं हितकारी वचनों को सुनकर भी उनकी अवहेलना करता है, वह निश्चय ही विनाश को प्राप्त होता है ॥43॥
 
The foolish person who disregarded the true and beneficial words of Yamadagninandan Parshuram even after hearing them, is definitely on the verge of destruction. 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)