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श्लोक 9.24.14  |
ततो ज्यातलनिर्घोष: पुनरासीद् विशाम्पते।
प्रादुरासीच्छराणां च सुमुक्तानां सुदारुण:॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| हे प्रजानाथ! तत्पश्चात् धनुष की प्रत्यंचा की टंकार और छोड़े हुए बाणों की भयंकर सीटी की ध्वनि पुनः सुनाई देने लगी ॥14॥ |
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| O Prajanath! Thereafter the twirling of the bowstring and the terrifying whistling sound of well-shot arrows began to be heard again. ॥ 14॥ |
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