श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 22: दुर्योधनका पराक्रम और उभयपक्षकी सेनाओंका घोर संग्राम  »  श्लोक 36-37h
 
 
श्लोक  9.22.36-37h 
तस्य तैरभवद् युद्धमिन्द्रियैरिव देहिन:॥ ३६॥
घोररूपमसंवार्यं निर्मर्यादमवर्तत।
 
 
अनुवाद
जैसे शरीर में स्थित जीवात्मा अपनी पाँचों इन्द्रियों से युद्ध करता है, वैसे ही कृपाचार्य उन पाँचों भाइयों से युद्ध करते थे। धीरे-धीरे वह युद्ध अत्यंत भयंकर, अनिवार्य और अनर्गल हो गया॥36 1/2॥
 
Just as a living soul in a body is at war with its five senses, similarly Kripacharya was at war with those five brothers. Gradually that war became extremely fierce, inevitable and unrestrained. ॥ 36 1/2 ॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)