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श्लोक 9.21.37  |
तं परे नाभ्यवर्तन्त मर्त्या मृत्युमिवाहवे।
अथान्यं रथमास्थाय हार्दिक्य: समपद्यत॥ ३७॥ |
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| अनुवाद |
| जिस प्रकार नश्वर मनुष्य अपनी मृत्यु को बदल नहीं सकते, उसी प्रकार शत्रु सैनिक युद्धभूमि में राजा दुर्योधन का सामना नहीं कर सकते थे। इतने में कृतवर्मा दूसरे रथ पर सवार होकर वहाँ आ पहुँचा। |
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| Just as mortal men cannot change their death, similarly the enemy soldiers could not face King Duryodhana on the battlefield. Meanwhile Kritavarma arrived there riding on another chariot. |
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इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि सात्यकिकृतवर्मयुद्धे एकविंशोऽध्याय:॥ २१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें सात्यकि और कृतवर्माका युद्धविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१॥
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