श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 2: राजा धृतराष्ट्रका विलाप करना और संजयसे युद्धका वृत्तान्त पूछना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  9.2.6 
अनेत्रत्वाद् यदेतेषां न मे रूपनिदर्शनम्।
पुत्रस्नेहकृता प्रीतिर्नित्यमेतेषु धारिता॥ ६॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि मैं अंधा था और मैंने कभी उनके रूप नहीं देखे थे, फिर भी पुत्र-स्नेह से उत्पन्न मेरे मन में उनके प्रति सदैव प्रेम था ॥6॥
 
Though I was blind and had never seen their forms, yet I always had the love for them born of the affection for my son. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)