श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 2: राजा धृतराष्ट्रका विलाप करना और संजयसे युद्धका वृत्तान्त पूछना  »  श्लोक 53-56h
 
 
श्लोक  9.2.53-56h 
वैशम्पायन उवाच
एवं वृद्धश्च संतप्त: पार्थिवो हतबान्धव:॥ ५३॥
मुहुर्मुहुर्मुह्यमान: पुत्राधिभिरभिप्लुत:।
विलप्य सुचिरं कालं धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुत:॥ ५४॥
दीर्घमुष्णं स नि:श्वस्य चिन्तयित्वा पराभवम्।
दु:खेन महता राजन् संतप्तो भरतर्षभ:॥ ५५॥
पुनर्गावल्गणिं सूतं पर्यपृच्छद् यथातथम्।
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! इस प्रकार अपने पुत्रों की चिन्ता से प्रायः अचेत रहने वाले, भारतवर्ष के श्रेष्ठ एवं वृद्ध राजा अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र बहुत देर तक शोक करते, गर्म श्वास लेते तथा अपनी पराजय का विचार करते हुए महान शोक से व्याकुल हो उठे और पुनः गवलगण के पुत्र संजय से युद्ध का यथार्थ समाचार पूछने लगे। 53—55 1/2॥
 
Vaishampayanji says- Rajan! In this way, Ambikanandan Dhritarashtra, the great and old king of Bharat, the best king of India, who was often unconscious due to the worry of his sons, mourned for a long time, drew a hot breath and thinking about his defeat, became overcome with great grief and again started asking Sanjay, the son of Gavalgan, for the actual news of the war. 53—55 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)