श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 19: पाण्डवसैनिकोंका आपसमें बातचीत करते हुए पाण्डवोंकी प्रशंसा और धृतराष्ट्रकी निन्दा करना तथा कौरव-सेनाका पलायन, भीमद्वारा इक्कीस हजार पैदलोंका संहार और दुर्योधनका अपनी सेनाको उत्साहित करना  »  श्लोक 65-66h
 
 
श्लोक  9.19.65-66h 
हत्वेह सुखमाप्नोति हत: प्रेत्य महत् फलम्।
न युद्धधर्माच्छ्रेयान् वै पन्था: स्वर्गस्य कौरवा:॥ ६५॥
अचिरेणैव ताँल्लोकान् हतो युद्धे समश्नुते।
 
 
अनुवाद
कौरवों! वीर पुरुष शत्रुओं को मारकर इस लोक में सुख भोगता है और यदि वह मारा जाए तो परलोक में महान पुण्य प्राप्त करता है; अतः युद्ध के कर्तव्य से बढ़कर स्वर्ग प्राप्ति का कोई उत्तम उपाय नहीं है। युद्ध में मारा गया वीर पुरुष अल्पकाल में ही उन प्रसिद्ध पुण्य लोकों में सुख भोगता है।॥65 1/2॥
 
‘Kauravas! A brave man enjoys happiness in this world by killing his enemy and if he is killed, he attains great rewards in the next world; hence there is no better way to attain heaven than the duty of war. A brave man killed in a war enjoys happiness in those famous virtuous worlds in a short time.’॥ 65 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)