शृण्वन्तु क्षत्रिया: सर्वे यावन्तोऽत्र समागता:॥ ६१॥
यदा शूरं च भीरुं च मारयत्यन्तक: सदा।
को नु मूढो न युध्येत पुरुष: क्षत्रियो ध्रुवम्॥ ६२॥
अनुवाद
यहाँ एकत्रित सभी क्षत्रियों को ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए - जब मृत्यु सदैव वीर और कायर दोनों को मारती है, तब ऐसा कौन मूर्ख है, जो क्षत्रिय कहलाने पर भी युद्ध नहीं करेगा?
All the Kshatriyas gathered here should listen carefully - when death always kills both the brave and the cowards, then who is the fool who, despite being called a Kshatriya, will definitely not fight?
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥