श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 19: पाण्डवसैनिकोंका आपसमें बातचीत करते हुए पाण्डवोंकी प्रशंसा और धृतराष्ट्रकी निन्दा करना तथा कौरव-सेनाका पलायन, भीमद्वारा इक्कीस हजार पैदलोंका संहार और दुर्योधनका अपनी सेनाको उत्साहित करना  »  श्लोक 18-19h
 
 
श्लोक  9.19.18-19h 
अद्यप्रभृति पार्थं च प्रेष्यभूत इवाचरन्॥ १८॥
विजानातु नृपो दु:खं यत् प्राप्तं पाण्डुनन्दनै:।
 
 
अनुवाद
‘आज से वह कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर की सेवा करते हुए स्वयं दास के समान हो जाए और अच्छी तरह समझ ले कि पूर्वकाल में पाण्डवों को कितना कष्ट सहना पड़ा था।’॥18 1/2॥
 
‘From today onwards, while serving Yudhishthira, the son of Kunti, he should himself become like a slave and understand well how much trouble the Pandavas had to suffer in the past.’॥ 18 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)