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श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 17: भीमसेनद्वारा राजा शल्यके घोड़े और सारथिका तथा युधिष्ठिरद्वारा राजा शल्य और उनके भाईका वध एवं कृतवर्माकी पराजय  »  श्लोक 65-66h
 
 
श्लोक  9.17.65-66h 
सकुण्डलं तद् ददृशे पतमानं शिरो रथात्॥ ६५॥
पुण्यक्षयमनुप्राप्य पतन् स्वर्गादिव च्युत:।
 
 
अनुवाद
उसका सिर, कुण्डलों सहित, रथ से नीचे गिरता हुआ दिखाई दे रहा था, मानो कोई आत्मा अपने पुण्यों के क्षीण हो जाने पर स्वर्ग से नीचे गिर रही हो।
 
His head along with its earrings was seen falling from the chariot to the ground like a soul falling from heaven after its merits are exhausted. 65 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)