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mahabharat 9.17.56-57h: उस धर्मयुद्धमें धर्मपुत्र युधिष्ठिरके द्वारा मारा गया वह राजा शल्ययज्ञमें घीकी आहुति पाकर शान्त हो जानेवाली 'स्विष्कृत' अग्निके समान सर्वथा शान्त हो गया ॥56 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 9.17: भीमसेनद्वारा राजा शल्यके घोड़े और सारथिका तथा युधिष्ठिरद्वारा राजा शल्य और उनके भाईका वध एवं कृतवर्माकी पराजय   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 17: भीमसेनद्वारा राजा शल्यके घोड़े और सारथिका तथा युधिष्ठिरद्वारा राजा शल्य और उनके भाईका वध एवं कृतवर्माकी पराजय  »  श्लोक 56-57h
 
 
श्लोक  9.17.56-57h 
धर्म्ये धर्मात्मना युद्धे निहतो धर्मसूनुना॥ ५६॥
सम्यग्घुत इव स्विष्ट: प्रशान्तोऽग्निरिवाध्वरे।
 
 
अनुवाद
उस धर्मयुद्धमें धर्मपुत्र युधिष्ठिरके द्वारा मारा गया वह राजा शल्ययज्ञमें घीकी आहुति पाकर शान्त हो जानेवाली 'स्विष्कृत' अग्निके समान सर्वथा शान्त हो गया ॥56 1/2॥
 
In that righteous war, the king who was killed by the righteous son of Dharma, Yudhishthira, became completely calm like 'Svishtkrit' fire which gets calmed after receiving the ritual offering of ghee in the surgical yagya. 56 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)