Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 9.17.44: पाण्डव लोग सदैव चन्दन, माला, उत्तम आसन, पेय और भोजन आदि अर्पित करके उसकी यत्नपूर्वक पूजा करते थे। वह प्रलयकालिक संवर्तक नामक अग्नि के समान प्रज्वलित होती थी और अथर्वंगीरस मन्त्रों द्वारा व्यक्त कर्मों के समान अत्यन्त भयंकर प्रतीत होती थी। 44॥   |   mahabharat अध्याय 9.17: भीमसेनद्वारा राजा शल्यके घोड़े और सारथिका तथा युधिष्ठिरद्वारा राजा शल्य और उनके भाईका वध एवं कृतवर्माकी पराजय   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 17: भीमसेनद्वारा राजा शल्यके घोड़े और सारथिका तथा युधिष्ठिरद्वारा राजा शल्य और उनके भाईका वध एवं कृतवर्माकी पराजय  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  9.17.44 
गन्धस्रगग्रॺासनपानभोजनै-
रभ्यर्चितां पाण्डुसुतै: प्रयत्नात्।
सांवर्तकाग्निप्रतिमां ज्वलन्तीं
कृत्यामथर्वाङ्गिरसीमिवोग्राम्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
पाण्डव लोग सदैव चन्दन, माला, उत्तम आसन, पेय और भोजन आदि अर्पित करके उसकी यत्नपूर्वक पूजा करते थे। वह प्रलयकालिक संवर्तक नामक अग्नि के समान प्रज्वलित होती थी और अथर्वंगीरस मन्त्रों द्वारा व्यक्त कर्मों के समान अत्यन्त भयंकर प्रतीत होती थी। 44॥
 
The Pandavas always worshiped him diligently by offering sandalwood, garlands, good seats, drinks and food etc. It would burn like the fire called Pralayakalik Samvartaka and would appear to be extremely fierce like the actions expressed through Atharvangiras mantras. 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)