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mahabharat 9.17.41: तत्पश्चात् कौरवों के प्रधान पुरुष महात्मा युधिष्ठिर ने उस सुन्दर एवं भयंकर अस्त्र तथा उस देदीप्यमान शक्ति को, जो बहुमूल्य रत्नों से जड़ित होने के कारण चमकती हुई प्रतीत होती थी, बड़े वेग से मद्रराज शल्य पर चलाया ॥41॥   |   mahabharat अध्याय 9.17: भीमसेनद्वारा राजा शल्यके घोड़े और सारथिका तथा युधिष्ठिरद्वारा राजा शल्य और उनके भाईका वध एवं कृतवर्माकी पराजय   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 17: भीमसेनद्वारा राजा शल्यके घोड़े और सारथिका तथा युधिष्ठिरद्वारा राजा शल्य और उनके भाईका वध एवं कृतवर्माकी पराजय  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  9.17.41 
ततस्तु शक्तिं रुचिरोग्रदण्डां
मणिप्रवेकोज्ज्वलितां प्रदीप्ताम्।
चिक्षेप वेगात् सुभृशं महात्मा
मद्राधिपाय प्रवर: कुरूणाम्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् कौरवों के प्रधान पुरुष महात्मा युधिष्ठिर ने उस सुन्दर एवं भयंकर अस्त्र तथा उस देदीप्यमान शक्ति को, जो बहुमूल्य रत्नों से जड़ित होने के कारण चमकती हुई प्रतीत होती थी, बड़े वेग से मद्रराज शल्य पर चलाया ॥41॥
 
Thereafter, Mahatma Yudhishthira, the supreme head of the Kauravas, wielded that beautiful and fierce weapon and that resplendent power, which appeared to be glowing because it was studded with precious gems, on Madraraja Shalya with great speed. 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)