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mahabharat 9.16.58-59h: जैसे वसन्त ऋतु में दो पलाश वृक्ष खिल जाते हैं, उसी प्रकार वे दोनों सुन्दर लग रहे थे। उन मतवाले, महामनस्वी और तेजस्वी वीरों को प्राणों पर जुआ खेलते देख सारी सेना निश्चय नहीं कर पा रही थी कि दोनों में कौन जीतेगा।   |   mahabharat अध्याय 9.16: पाण्डव-सैनिकों और कौरव-सैनिकोंका द्वन्द्वयुद्ध, भीमसेनद्वारा दुर्योधनकी तथा युधिष्ठिरद्वारा शल्यकी पराजय   ।   mahabharat पर्व 9: शल्य पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 16: पाण्डव-सैनिकों और कौरव-सैनिकोंका द्वन्द्वयुद्ध, भीमसेनद्वारा दुर्योधनकी तथा युधिष्ठिरद्वारा शल्यकी पराजय  »  श्लोक 58-59h
 
 
श्लोक  9.16.58-59h 
पुष्पितौ शुशुभाते वै वसन्ते किंशुकौ यथा।
दीप्यमानौ महात्मानौ प्राणद्यूतेन दुर्मदौ॥ ५८॥
दृष्ट्वा सर्वाणि सैन्यानि नाध्यवस्यंस्तयोर्जयम्।
 
 
अनुवाद
जैसे वसन्त ऋतु में दो पलाश वृक्ष खिल जाते हैं, उसी प्रकार वे दोनों सुन्दर लग रहे थे। उन मतवाले, महामनस्वी और तेजस्वी वीरों को प्राणों पर जुआ खेलते देख सारी सेना निश्चय नहीं कर पा रही थी कि दोनों में कौन जीतेगा।
 
Just as two Palaash trees bloom in the spring season, similarly they both looked beautiful. Seeing those intoxicated, great-minded and radiant heroes gambling with their lives, the entire army was unable to decide who would win between the two. 58 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)