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श्लोक 9.15.43  |
तत्र शल्यरथं राजन् विचरन्तं महाहवे।
अपश्याम यथापूर्वं शक्रस्यासुरसंक्षये॥ ४३॥ |
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| अनुवाद |
| महाराज! जिस प्रकार प्राचीन काल में राक्षसों का नाश करते समय इन्द्र का रथ आगे बढ़ता था, उसी प्रकार उस महायुद्ध में हमने राजा शल्य का रथ आगे बढ़ता हुआ देखा। |
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| King! Just as in ancient times Indra's chariot used to move forward while destroying the demons, in the same way we saw King Shalya's chariot moving in that great war. |
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इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे पञ्चदशोऽध्याय:॥ १५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५॥
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