श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 15: दुर्योधन और धृष्टद्युम्नका एवं अर्जुन और अश्वत्थामाका तथा शल्यके साथ नकुल और सात्यकि आदिका घोर संग्राम  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  9.15.40 
तत्र राजन् शरैर्मुक्तैर्निर्मुक्तैरिव पन्नगै:।
स्वर्णपुङ्खै: प्रकाशद्भिर्व्यरोचन्त दिशस्तदा॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! उस समय वहाँ छोड़े गए सुवर्ण पंखवाले चमकते हुए बाणों से सम्पूर्ण दिशाएँ प्रकाशित हो रही थीं, मानो सर्प अपने केंचुल उतार रहे हों ॥40॥
 
O King! At that time all directions were illuminated by the shining arrows with golden feathers that were shot there, like serpents shedding their skin. ॥ 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)