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श्लोक  9.11.53-54 
पटुघण्टाशतरवां वासवीमशनीमिव।
निर्मुक्ताशीविषाकारां पृक्तां गजमदैरपि॥ ५३॥
त्रासनीं सर्वभूतानां स्वसैन्यपरिहर्षिणीम्।
मनुष्यलोके विख्यातां गिरिशृङ्गविदारणीम्॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
उसमें सैकड़ों घंटियाँ लगी थीं, जिनकी चिंघाड़ की ध्वनि गूँजती रहती थी। वह इंद्र के वज्र के समान भयानक प्रतीत होती थी। जैसे विषैला सर्प केंचुल छोड़कर समस्त प्राणियों के हृदय में भय उत्पन्न करता था और अपनी सेना का हर्ष बढ़ाता रहता था। उसमें हाथी की कस्तूरी लिपटी रहती थी। पर्वत शिखरों को भेदने वाली वह गदा मानव लोक में सर्वत्र विख्यात है। 53-54।
 
Hundreds of bells were fitted in it, whose chirping sound kept resonating. It appeared as terrifying as Indra's thunderbolt. Like a poisonous snake shed its skin, it instilled fear in the hearts of all creatures and kept increasing the joy of its army. Elephant's musk was wrapped in it. That mace, which pierces mountain peaks, is famous everywhere in the human world. 53-54.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)