श्री महाभारत  »  पर्व 9: शल्य पर्व  »  अध्याय 1: संजयके मुखसे शल्य और दुर्योधनके वधका वृत्तान्त सुनकर राजा धृतराष्ट्रका मूर्च्छित होना और सचेत होनेपर उन्हें विदुरका आश्वासन देना  »  श्लोक 44-46
 
 
श्लोक  9.1.44-46 
लब्ध्वा तु स नृप: संज्ञां वेपमान: सुदु:खित:॥ ४४॥
उदीक्ष्य च दिश: सर्वा: क्षत्तारं वाक्यमब्रवीत्।
विद्वन् क्षत्तर्महाप्राज्ञ त्वं गतिर्भरतर्षभ॥ ४५॥
ममानाथस्य सुभृशं पुत्रैर्हीनस्य सर्वश:।
एवमुक्त्वा ततो भूयो विसंज्ञो निपपात ह॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
होश में आने पर राजा धृतराष्ट्र अत्यन्त दुःखी हो गये और काँपने लगे। वे सब दिशाओं की ओर देखते हुए विदुर से इस प्रकार बोले - 'विद्वान! महापंडित विदुर! हे भारतभूषण! अब मुझ निःसन्तान और अनाथ के आप ही एकमात्र आधार हैं।' ऐसा कहकर वे पुनः अचेत होकर भूमि पर गिर पड़े।
 
After regaining consciousness, king Dhritarashtra became very sad and started trembling. Looking at all the directions, he spoke to Vidur thus - 'Learned one! Great scholar Vidur! O Bharatbhushan! Now you are the only support for me, who is childless and orphan.' Having said this, he again became unconscious and fell on the ground.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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