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mahabharat 8.94.50: ऐसा प्रतीत होने लगा कि आकाश फट गया है, पृथ्वी चीखने लगी, भयंकर शुष्क वायु चलने लगी, समस्त दिशाएँ धुएँ और अग्नि से दहकने लगीं और समुद्र भयंकर गर्जना करने लगे और व्याकुल हो उठे॥50॥   |   mahabharat अध्याय 8.94: शल्यके द्वारा रणभूमिका दिग्दर्शन, कौरव-सेनाका पलायन और श्रीकृष्ण तथा अर्जुनका शिविरकी ओर गमन   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 94: शल्यके द्वारा रणभूमिका दिग्दर्शन, कौरव-सेनाका पलायन और श्रीकृष्ण तथा अर्जुनका शिविरकी ओर गमन  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  8.94.50 
नभ: पफालेव ननाद चोर्वी
ववुश्च वाता: परुषा: सुघोरा:।
दिशो बभूवुर्ज्वलिता: सधूमा
महार्णवा: सस्वनुश्चुक्षुभुश्च॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
ऐसा प्रतीत होने लगा कि आकाश फट गया है, पृथ्वी चीखने लगी, भयंकर शुष्क वायु चलने लगी, समस्त दिशाएँ धुएँ और अग्नि से दहकने लगीं और समुद्र भयंकर गर्जना करने लगे और व्याकुल हो उठे॥50॥
 
The sky seemed to be splitting, the earth began to shriek, a terrible and dry wind began to blow, all directions appeared to be ablaze with smoke and fire and the oceans began to roar terribly and become agitated.॥ 50॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)