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mahabharat 8.94.39: व्याघ्रराज! उत्तम सुवर्ण के समान चमकने वाला वह कान प्रज्वलित अग्नि के समान चमक रहा था; किन्तु पार्थ के बाणरूपी जल से वह बुझ गया॥39॥   |   mahabharat अध्याय 8.94: शल्यके द्वारा रणभूमिका दिग्दर्शन, कौरव-सेनाका पलायन और श्रीकृष्ण तथा अर्जुनका शिविरकी ओर गमन   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  8.94.39 
कनकोत्तमसंकाशो ज्वलन्निव विभावसु:।
स शान्त: पुरुषव्याघ्र पार्थसायकवारिणा॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
व्याघ्रराज! उत्तम सुवर्ण के समान चमकने वाला वह कान प्रज्वलित अग्नि के समान चमक रहा था; किन्तु पार्थ के बाणरूपी जल से वह बुझ गया॥39॥
 
King of tigers! The ear, shining like the finest gold, was shining like a blazing fire; But it was extinguished by Partha's arrow-like water. 39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)