श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 94: शल्यके द्वारा रणभूमिका दिग्दर्शन, कौरव-सेनाका पलायन और श्रीकृष्ण तथा अर्जुनका शिविरकी ओर गमन  »  श्लोक 18-19h
 
 
श्लोक  8.94.18-19h 
चापानि रुक्माङ्गदभूषणानि
शराश्च कार्तस्वरचित्रपुङ्खा:।
ऋष्ट्यश्च पीता विमला विकोशा:
प्रासाश्च दण्डै: कनकावभासै:॥ १८॥
छत्राणि वालव्यजनानि शङ्खा-
श्छिन्नापविद्धाश्च स्रजो विचित्रा:।
 
 
अनुवाद
सोने के कुण्डलों से सुशोभित धनुष, विचित्र सुनहरे पंखों वाले बाण, ऋष्टि, जल से भरी हुई शुद्ध तलवार, म्यान रहित तलवार, स्वर्ण दण्ड से युक्त प्रासा, छत्र, पंखा, शंख और विचित्र मालाएँ, ये सब टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गये।
 
The bow adorned with golden rings, the arrows with strange golden feathers, the Rishti, the pure sword with water and without sheath, the prasa with golden staff, the umbrella, the fan, the conch and strange garlands were all lying scattered in pieces.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)