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श्लोक 8.93.52-54h  |
न तं देशं प्रपश्यामि यत्र याता भयार्दिता:॥ ५२॥
गतानां यत्र वै मोक्ष: पाण्डवात् किं गतेन व:।
अल्पं च बलमेतेषां कृष्णौ च भृशविक्षतौ॥ ५३॥
अद्य सर्वान् हनिष्यामि ध्रुवो हि विजयो भवेत्। |
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| अनुवाद |
| योद्धाओं! तुम भय से व्याकुल हो रहे हो। किन्तु मुझे ऐसा कोई स्थान नहीं दिख रहा जहाँ तुम भागकर पाण्डुपुत्र अर्जुन या भीमसेन से छुटकारा पा सको। ऐसी स्थिति में तुम्हारे भागने से क्या लाभ? इन शत्रुओं के पास तो थोड़ी सी ही सेना बची है। श्रीकृष्ण और अर्जुन भी बुरी तरह घायल हैं; अतः आज मैं इन सबका वध कर दूँगा। हमारी विजय अवश्य होगी।' |
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| ‘Warriors! You are suffering from fear. But I do not see any place where you can run away and get rid of Panduputra Arjun or Bhimsen. In such a situation, what is the use of your running away? These enemies have only a small army left. Shri Krishna and Arjun are also badly injured; hence today I will kill all these people. We will definitely win. |
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