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श्लोक 8.92.15  |
एतद् वचो मद्रपतेर्निशम्य
स्वं चाप्यनीतं मनसा निरीक्ष्य।
दुर्योधनो दीनमना विसंज्ञ:
पुन: पुनर्न्यश्वसदार्तरूप:॥ १५॥ |
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| अनुवाद |
| मद्रराज शल्य के ये वचन सुनकर तथा अपने अन्याय का विचार करके दुर्योधन अत्यन्त दुःखी और दुःखी हो गया। वह अत्यन्त व्याकुल और अचेत हो गया तथा बार-बार आहें भरने लगा॥15॥ |
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| Hearing these words of Madra king Shalya and also reflecting on his own injustice, Duryodhan became very sad and unhappy. He became extremely distressed and almost unconscious and started sighing repeatedly.॥ 15॥ |
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इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि शल्यप्रत्यागमने द्विनवतितमोऽध्याय:॥ ९२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें शल्यका युद्धसे प्रत्यागमनविषयक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९२॥
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