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mahabharat 8.91.60: कर्ण का कटा हुआ सिर वायु के वेग से टूटे हुए पर्वत के समान, यज्ञ के अंत में बुझी हुई अग्नि के समान तथा पश्चिम दिशा में स्थित सूर्य की प्रतिमा के समान शोभा पा रहा था ॥60॥   |   mahabharat अध्याय 8.91: भगवान् श्रीकृष्णका कर्णको चेतावनी देना और कर्णका वध   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 91: भगवान् श्रीकृष्णका कर्णको चेतावनी देना और कर्णका वध  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  8.91.60 
महानिलेनाद्रिमिवापविद्धं
यज्ञावसानेऽग्निमिव प्रशान्तम्।
रराज कर्णस्य शिरो निकृत्त-
मस्तं गतं भास्करस्येव बिम्बम्॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
कर्ण का कटा हुआ सिर वायु के वेग से टूटे हुए पर्वत के समान, यज्ञ के अंत में बुझी हुई अग्नि के समान तथा पश्चिम दिशा में स्थित सूर्य की प्रतिमा के समान शोभा पा रहा था ॥60॥
 
The severed head of Karna looked as beautiful as a piece of mountain broken by the force of wind, like the fire extinguished at the end of a yajna and like the image of the Sun at its west point. ॥ 60॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)