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mahabharat 8.91.12: यदि उन अवसरों पर यह धर्म नहीं था, तो आज यहाँ भी धर्म का आह्वान करके अपने मन को प्रसन्न करने से क्या लाभ? सूत! यहाँ तुम चाहे कितने भी धर्म के कार्य करो, फिर भी जीते जी तुम्हारा उद्धार नहीं हो सकता॥ 12॥   |   mahabharat अध्याय 8.91: भगवान् श्रीकृष्णका कर्णको चेतावनी देना और कर्णका वध   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 91: भगवान् श्रीकृष्णका कर्णको चेतावनी देना और कर्णका वध  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  8.91.12 
यद्येष धर्मस्तत्र न विद्यते हि
किं सर्वथा तालुविशोषणेन।
अद्येह धर्म्याणि विधत्स्व सूत
तथापि जीवन्न विमोक्ष्यसे हि॥ १२॥
 
 
अनुवाद
यदि उन अवसरों पर यह धर्म नहीं था, तो आज यहाँ भी धर्म का आह्वान करके अपने मन को प्रसन्न करने से क्या लाभ? सूत! यहाँ तुम चाहे कितने भी धर्म के कार्य करो, फिर भी जीते जी तुम्हारा उद्धार नहीं हो सकता॥ 12॥
 
If this was not Dharma on those occasions, then what is the use of pleasing your palate by invoking Dharma here even today? Suta! No matter how many acts of Dharma you perform here, you cannot be redeemed while you are alive.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)