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mahabharat 8.90.86: धर्म को जानने वाले पुरुषों ने सदैव कहा है कि 'धर्म सदैव धर्म परायण मनुष्य की रक्षा करता है। हम अपनी शक्ति और ज्ञान के अनुसार सदैव धर्म का पालन करने का प्रयत्न करते हैं, परंतु वह भी हमारा नाश करता है और भक्तों की रक्षा नहीं करता; अतः मैं समझता हूँ कि धर्म सदैव किसी की रक्षा नहीं करता।'॥86॥   |   mahabharat अध्याय 8.90: अर्जुन और कर्णका घोर युद्ध, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा तथा कर्णका अपना पहिया पृथ्वीमें फँस जानेपर अर्जुनसे बाण न चलानेके लिये अनुरोध करना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 90: अर्जुन और कर्णका घोर युद्ध, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा तथा कर्णका अपना पहिया पृथ्वीमें फँस जानेपर अर्जुनसे बाण न चलानेके लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  8.90.86 
धर्मप्रधानं किल पाति धर्म
इत्यब्रुवन् धर्मविद: सदैव।
वयं च धर्मे प्रयताम नित्यं
चर्तुं यथाशक्ति यथाश्रुतं च।
स चापि निघ्नाति न पाति भक्तान्
मन्ये न नित्यं परिपाति धर्म:॥ ८६॥
 
 
अनुवाद
धर्म को जानने वाले पुरुषों ने सदैव कहा है कि 'धर्म सदैव धर्म परायण मनुष्य की रक्षा करता है। हम अपनी शक्ति और ज्ञान के अनुसार सदैव धर्म का पालन करने का प्रयत्न करते हैं, परंतु वह भी हमारा नाश करता है और भक्तों की रक्षा नहीं करता; अतः मैं समझता हूँ कि धर्म सदैव किसी की रक्षा नहीं करता।'॥86॥
 
‘The men having knowledge of Dharma have always said that ‘Dharma always protects the man who is devoted to Dharma. We always try to follow Dharma according to our strength and knowledge, but that also kills us and does not protect the devotees; hence I understand that Dharma does not always protect anyone.’॥ 86॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)