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mahabharat 8.90.54: संजय कहते हैं - हे राजन! तब अर्जुन ने क्रोध में भरकर घूमकर अत्यन्त तीक्ष्ण धार वाले छः बाणों द्वारा आकाश में तिरछी गति से उड़ते हुए उस सर्प को टुकड़े-टुकड़े कर दिया। उसका शरीर टुकड़े-टुकड़े हो जाने के कारण वह पृथ्वी पर गिर पड़ा।   |   mahabharat अध्याय 8.90: अर्जुन और कर्णका घोर युद्ध, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा तथा कर्णका अपना पहिया पृथ्वीमें फँस जानेपर अर्जुनसे बाण न चलानेके लिये अनुरोध करना   ।   mahabharat पर्व 8: कर्ण पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 8: कर्ण पर्व  »  अध्याय 90: अर्जुन और कर्णका घोर युद्ध, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा तथा कर्णका अपना पहिया पृथ्वीमें फँस जानेपर अर्जुनसे बाण न चलानेके लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  8.90.54 
संजय उवाच
तत: स जिष्णु: परिवृत्य रोषा-
च्चिच्छेद षड्‍‍भिर्निशितै: सुधारै:।
नागं वियत्तिर्यगिवोत्पतन्तं
स च्छिन्नगात्रो निपपात भूमौ॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
संजय कहते हैं - हे राजन! तब अर्जुन ने क्रोध में भरकर घूमकर अत्यन्त तीक्ष्ण धार वाले छः बाणों द्वारा आकाश में तिरछी गति से उड़ते हुए उस सर्प को टुकड़े-टुकड़े कर दिया। उसका शरीर टुकड़े-टुकड़े हो जाने के कारण वह पृथ्वी पर गिर पड़ा।
 
Sanjaya says - O King! Then Arjuna turned around in anger and with six sharp arrows of very sharp edge, he cut the snake flying in the sky at an oblique speed into pieces. Due to its body being torn into pieces, it fell on the earth.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)